आ पतझर
आ, गिरा पीले पात
ला हरापन!
-डॉ. जीवनप्रकाश जोशी
आनन्द गान
आरोह में खो जाऊँ
प्रिय हो जाऊँ!
-डॉ. कविता भट्ट
आनंद कभी
व्याख्यायित हुआ है
हवा है वह
-डॉ. भगवतशरण अग्रवाल
आधुनिकता
अगवा कर लायी
गाँव के गाँव
-डॉ. राजकुमार पाटिल
आदि से अंत
तुम खड़े सौ पर
मैं शून्य पर!
-सुशीला जोशी
अचेत नदी
बिन माँ के बच्चों–सी
सुबके रेत
-नरेन्द्र श्रीवास्तव
आदमी नहीं
ईंट–खण्डहरों में
जीता शहर
-डॉ. कमलकिशोर गोयनका
आदमी खड़ा
बिजूके की तरह
बीच शहर
-पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी
आदमियत
बराबरी, सद्भाव
मेल-मिलाप
-राजेन्द्र धस्माना
आत्मपीड़ा ही
कविता कहलाती
कागज पर
-कुसुम गोयनका
आते ही आते
तानाशाह सूर्य ने
दीये बुझाये
-कमलेश भट्ट कमल
आती सवारी
होशियार रहना
दूध के घोड़े
-अश्विनी कुमार आलोक
आती छन के
नीले खस पर्दे से
ठंडी फुहार
-डॉ. सत्यपाल चुघ
आती हैं कब
खुशियाँ हवाओं–सी
गुजर जातीं
-डॉ. सविता खन्ना
आतीं किनारे
लहरें समुद्र की
पग-फेरों में
-योगेन्द्र वर्मा
अपनापन
अपनों में खोजना
रेत में सुई
-निवेदिताश्री
अपने रूठे
जग वालों के साथ
नाते यूँ टूटे !
-आनंद सिंघनपुरी
अपने ‘पर’
तौलते रहे पक्षी
दरख़्तों पर
-बृजेश त्रिपाठी
अपने तट
डूबते देखती है
उफनती नदी
-गंगा पांडेय भावुक
अपने जाये
अपनों के हो गये
बुढ़ापा रोये
-भगवत भट्ट