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Thursday, December 28, 2023

आ पतझर

आ पतझर
आ, गिरा पीले पात
ला हरापन!

-डॉ. जीवनप्रकाश जोशी

आनन्द गान

आनन्द गान
आरोह में खो जाऊँ
प्रिय हो जाऊँ!

-डॉ. कविता भट्ट

आनंद कभी

आनंद कभी
व्याख्यायित हुआ है
हवा है वह

-डॉ. भगवतशरण अग्रवाल

आधुनिकता

आधुनिकता
अगवा कर लायी
गाँव के गाँव

-डॉ. राजकुमार पाटिल

आदि से अंत

आदि से अंत
तुम खड़े सौ पर
मैं शून्य पर!

-सुशीला जोशी

Thursday, September 28, 2023

अचेत नदी

अचेत नदी
बिन माँ के बच्चों–सी
सुबके रेत

-नरेन्द्र श्रीवास्तव

Thursday, August 03, 2023

आदमी नहीं

आदमी नहीं
ईंट–खण्डहरों में
जीता शहर
-डॉ. कमलकिशोर गोयनका

आदमी खड़ा

आदमी खड़ा
बिजूके की तरह
बीच शहर 
-पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी

आदमियत

आदमियत
बराबरी, सद्भाव
मेल-मिलाप
-राजेन्द्र धस्माना

आत्मपीड़ा ही

आत्मपीड़ा ही
कविता कहलाती
कागज पर
-कुसुम गोयनका

आते ही आते

आते ही आते
तानाशाह सूर्य ने
दीये बुझाये
-कमलेश भट्ट कमल

आती सवारी

आती सवारी
होशियार रहना
दूध के घोड़े
-अश्विनी कुमार आलोक

आती छन के

आती छन के
नीले खस पर्दे से
ठंडी फुहार
-डॉ. सत्यपाल चुघ

आती हैं कब

आती हैं कब
खुशियाँ हवाओं–सी
गुजर जातीं
-डॉ. सविता खन्ना

आतीं किनारे

आतीं किनारे
लहरें समुद्र की
पग-फेरों में
-योगेन्द्र वर्मा

अपनापन

अपनापन
अपनों में खोजना
रेत में सुई

-निवेदिताश्री

Wednesday, June 21, 2023

अपने रूठे

अपने रूठे
जग वालों के साथ
नाते यूँ टूटे !

-आनंद सिंघनपुरी

अपने ‘पर’

अपने ‘पर’
तौलते रहे पक्षी
दरख़्तों पर 

-बृजेश त्रिपाठी

अपने तट

अपने तट
डूबते देखती है
उफनती नदी

-गंगा पांडेय भावुक

अपने जाये

अपने जाये
अपनों के हो गये
बुढ़ापा रोये

-भगवत भट्ट